
राजस्थान हाईकोर्ट ने पंचायत चुनावों में हो रही देरी पर सख्त टिप्पणी की है. अदालत ने कहा कि परिसीमन (सीमांकन) की आड़ में चुनाव को बार-बार टालना संविधान की भावना के खिलाफ है. पंचायतें लोकतंत्र की निचली इकाई हैं. इन्हें लंबे समय तक प्रशासकों के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता. यह आदेश हाईकोर्ट के जस्टिस अनूप ढंड ने महावीर प्रसाद और अन्य 16 याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया. अदालत ने स्पष्ट कहा कि जिन पंचायतों का कार्यकाल पूरा हो चुका है वहां अधिकतम छह महीने के भीतर चुनाव होना अनिवार्य है.
2020 में भी परिसीमन की वजह से पंचायत चुनाव टले थे
कोर्ट ने कहा कि संविधान की धारा-38 के तहत लोकतांत्रिक संस्थाओं का सुचारू संचालन करना सरकार की जिम्मेदारी है. प्रशासकों को लंबे समय तक बिठाए रखना लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करता है. कोर्ट के इस आदेश के बाद माना जा रहा है कि राज्य सरकार या राज्य निर्वाचन आयोग सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं. राजस्थान में 2020 में भी परिसीमन की वजह से पंचायत चुनाव टले थे. उस समय भी सुप्रीम कोर्ट में अतिरिक्त समय की मांग की गई थी.
सरकार चुनाव नहीं कराए तो राज्य निर्वाचन आयोग का दायित्व है कि वह लोकतांत्रिक स्थानीय शासन की बहाली के लिए दखल करे। चुनाव नहीं होने से स्थानीय शासन में रिक्तता आती है, जिसका सेवाओं की प्रदायगी पर विपरीत असर होता है। कोर्ट ने उम्मीद जताई कि सरकार जल्द चुनाव कराएगी। कोर्ट ने बिना प्रक्रिया अपनाए निलम्बित पंचायत प्रशासकों को बहाल कर दिया, वहीं कानूनी प्रक्रिया अपनाकर पुन: कार्रवाई की छूट दी