
राजस्थान विधानसभा में हालिया सत्र के दौरान विपक्ष ने सरकार से सवाल पूछे—महंगाई, बेरोज़गारी, कानून-व्यवस्था और किसानों के मुद्दों पर। जवाब में सत्तापक्ष ने पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस सरकार के पाँच सालों में जिन समस्याओं को जड़ जमा लेने दी गई, उन्हें भाजपा सरकार ने सिर्फ दो वर्षों में नियंत्रित करने की कोशिश की है।
इस दौरान तीखी बहस, शोर-शराबा और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप भी देखने को मिले। सदन के बाहर भी यही बहस जारी रही—“कौन बेहतर रहा?”
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने अपने अब तक के कार्यकाल में कुछ स्पष्ट प्राथमिकताएँ तय की हैं—
सरकार का दावा है कि निर्णय लेने की गति तेज़ हुई है। अफसरशाही पर नियंत्रण, फाइलों के लंबित रहने की समस्या और योजनाओं के क्रियान्वयन पर निगरानी को सरकार अपनी बड़ी उपलब्धि बता रही है।
भाजपा सरकार का कहना है कि संगठित अपराध, पेपर लीक और भ्रष्टाचार के मामलों पर पहले की तुलना में अधिक कठोर कार्रवाई की गई। कई हाई-प्रोफाइल मामलों में एजेंसियों को खुली छूट देने का दावा भी किया गया।
सरकार ने वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने और राजस्व संग्रह बढ़ाने की बात कही है। अनावश्यक सब्सिडी और खर्चों पर कटौती को “भविष्य की स्थिरता” से जोड़ा गया।
भजनलाल शर्मा सरकार की एक बड़ी ताकत केंद्र के साथ बेहतर समन्वय को माना जा रहा है। केंद्र प्रायोजित योजनाओं का तेज़ी से क्रियान्वयन और अतिरिक्त फंड लाने को सरकार अपनी उपलब्धि बताती है।
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का कार्यकाल लंबा रहा और उसमें कई बड़े फैसले लिए गए।
चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना, न्यूनतम आय गारंटी, और सामाजिक पेंशन जैसी योजनाओं ने गहलोत सरकार को “वेलफेयर स्टेट” की पहचान दी। इन योजनाओं का सीधा लाभ आम जनता को मिला।
सरकारी अस्पतालों में मुफ्त जांच-इलाज, दवा वितरण और स्कूल-कॉलेजों के विस्तार को गहलोत सरकार की बड़ी उपलब्धि माना गया।
गहलोत के पास प्रशासनिक अनुभव की कमी नहीं थी। संकट प्रबंधन, विपक्ष को साधना और राजनीतिक संतुलन बनाए रखना उनकी बड़ी ताकत रही।
हालांकि, पेपर लीक घोटाले, आंतरिक गुटबाज़ी और अंतिम वर्षों में प्रशासनिक ढिलाई को लेकर सरकार को भारी आलोचना झेलनी पड़ी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल समय के आधार पर तुलना पूरी तस्वीर नहीं दिखाती।
दो साल में आमतौर पर सरकारें नीतिगत दिशा तय करती हैं
पाँच साल में योजनाओं का असर ज़मीनी स्तर पर दिखता है
भजनलाल शर्मा सरकार अभी “सुधार और सुधारात्मक कार्रवाई” के चरण में है, जबकि गहलोत सरकार का मूल्यांकन “परिणाम और प्रभाव” के आधार पर किया जाता है।
राजस्थान के शहरी इलाकों में कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक सख़्ती को लेकर सरकार को सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक योजनाओं में बदलाव और कुछ लाभ बंद होने को लेकर नाराज़गी भी देखी जा रही है।
कई लोग मानते हैं कि—
गहलोत सरकार ने राहत दी
भजनलाल सरकार नियंत्रण और अनुशासन पर ज़ोर दे रही है
यह बहस सिर्फ विधानसभा तक सीमित नहीं है। यह आगामी चुनावों की पटकथा भी लिख रही है। भाजपा “कम समय में ज़्यादा काम” का नैरेटिव गढ़ना चाहती है, जबकि कांग्रेस “पाँच साल की स्थायी योजनाओं” को याद दिला रही है।
अगर सवाल यह हो कि क्या भजनलाल शर्मा के दो साल, अशोक गहलोत के पाँच सालों पर भारी हैं?
तो जवाब सीधा “हाँ” या “नहीं” में देना मुश्किल है।
नीति और प्रशासनिक सख़्ती के मामले में भजनलाल शर्मा सरकार आगे दिखती है
सामाजिक सुरक्षा और जनकल्याण के क्षेत्र में अशोक गहलोत सरकार की विरासत अभी भी प्रभावशाली है
अंततः फैसला जनता करेगी—विधानसभा में नहीं, बल्कि चुनावी मैदान में।