राज्यपाल बोले- संस्कृत के अधिक प्रयोग से बनेगी जनभाषा

संस्कृत विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में राज्यपाल बोले- शिक्षा ऐसी हो, जो विद्यार्थियों को विवेकवान बनाए

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संस्कृत विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में राज्यपाल बोले- ऐसी शिक्षा जरूरी, जिससे विद्यार्थी विवेकवान बनें

 जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर का अष्टम दीक्षान्त समारोह सोमवार को आयोजित हुआ। समारोह में राज्यपाल एवं कुलाधिपति हरिभाऊ बागडे ने विद्यार्थियों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों को केवल किताबों की शिक्षा तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। उन्हें ऐसी शिक्षा भी दी जानी चाहिए, जो उन्हें जीवन के सही फैसले लेने और समझदारी से आगे बढ़ने में मदद करे।

राज्यपाल ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना नहीं है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जिससे विद्यार्थी ज्ञान के साथ विवेक भी विकसित कर सकें और समाज के लिए जिम्मेदारी से काम कर सकें।

बार-बार इस्तेमाल से संस्कृत जनभाषा बनेगी

राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने संस्कृत भाषा के महत्व पर भी बात की। उन्होंने कहा कि संस्कृत का जितना अधिक इस्तेमाल होगा, उतनी ही तेजी से यह भाषा आगे बढ़ेगी।

उन्होंने कहा कि संस्कृत भारत की प्राचीन भाषाओं में से एक है और लंबे समय तक यह भाषा मौखिक और श्रुति परंपरा के माध्यम से आगे बढ़ती रही। उन्होंने कहा कि भारत के बाहर से आने वाले लोग भी संस्कृत सीखते थे।

राज्यपाल ने लोगों से संस्कृत के अधिक से अधिक प्रयोग की अपील की। उन्होंने कहा कि किसी भाषा को मजबूत बनाने के लिए उसका लगातार इस्तेमाल जरूरी है।

भारत की ज्ञान परंपरा का किया जिक्र

राज्यपाल ने अपने संबोधन में भारत की पुरानी ज्ञान परंपरा का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत में हजारों वर्षों से विज्ञान, शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम होते रहे हैं।

उन्होंने अगस्त्य ऋषि और भारद्वाज ऋषि का जिक्र करते हुए प्राचीन भारतीय ज्ञान की चर्चा की। राज्यपाल ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा बहुत समृद्ध रही है और इसे समझने की जरूरत है।

उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां के पुस्तकालय को जला दिया गया था, लेकिन ज्ञान को खत्म नहीं किया जा सकता। लोगों ने इस ज्ञान को अपने साथ सुरक्षित रखा और आगे की पीढ़ियों तक पहुंचाया।

भारतीय ज्ञान को आगे बढ़ाने पर जोर

राज्यपाल ने कहा कि भारत के ज्ञान और परंपराओं को लंबे समय तक सही तरीके से सामने नहीं रखा गया। उन्होंने भारतीय वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान से जुड़े कई उदाहरणों का उल्लेख किया।

उन्होंने शिवकर बापू तलपड़े का भी जिक्र किया और कहा कि भारतीय प्रतिभाओं के योगदान को भी इतिहास में उचित स्थान मिलना चाहिए।

राज्यपाल ने शिक्षा व्यवस्था पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि ऐसी शिक्षा की जरूरत है, जो विद्यार्थियों में आत्मविश्वास पैदा करे और उन्हें अपने देश की संस्कृति, इतिहास और ज्ञान परंपरा से परिचित कराए।

संतों का जीवन समाज के लिए होता है

राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने संत-महात्माओं के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि उनका जीवन केवल अपने लिए नहीं होता, बल्कि पूरे समाज के हित के लिए होता है।

उन्होंने रामानंदाचार्य जी के प्रसिद्ध संदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि भक्ति और मानवता में जात-पात का भेद नहीं होना चाहिए।

उन्होंने संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रणेता नारायणदासजी महाराज को दूरदर्शी बताया। राज्यपाल ने कहा कि संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना उनके भविष्य की ज्ञान दृष्टि का परिणाम है।

विद्यार्थियों को मिली डिग्री और स्वर्ण पदक

दीक्षान्त समारोह के दौरान विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को विभिन्न उपाधियां प्रदान की गईं। पीएचडी पूरी करने वाले विद्यार्थियों को उपाधियां दी गईं। इसके अलावा सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया गया।

समारोह में विद्यार्थियों और उनके परिजनों में खासा उत्साह देखने को मिला। डिग्री और स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के लिए यह दिन उनके शैक्षणिक जीवन का महत्वपूर्ण अवसर रहा।

दो शिक्षाविदों को मानद उपाधि

समारोह के दौरान ब्रह्मर्षि श्री गुरुवानंद स्वामी और प्रो. रमेश कुमार पांडे को विद्यावाचस्पति की मानद उपाधि प्रदान की गई।

विश्वविद्यालय की ओर से शिक्षा और संस्कृत के क्षेत्र में योगदान को देखते हुए उन्हें यह सम्मान दिया गया।

राजस्थान मंत्र प्रतिष्ठान की वेबसाइट लॉन्च

दीक्षान्त समारोह के दौरान राज्यपाल ने विश्वविद्यालय की पहल पर स्थापित राजस्थान मंत्र प्रतिष्ठान की वेबसाइट का भी लोकार्पण किया।

इस पहल को संस्कृत और मंत्र परंपरा से जुड़ी जानकारी को डिजिटल माध्यम से लोगों तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

कुलगुरु ने पेश की विश्वविद्यालय की प्रगति रिपोर्ट

समारोह में विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. मदन मोहन झा ने विश्वविद्यालय की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने विश्वविद्यालय में चल रहे शैक्षणिक और अन्य कार्यों की जानकारी दी।

वहीं केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने दीक्षान्त भाषण दिया। उन्होंने विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का संदेश दिया।

शिक्षा में ज्ञान के साथ विवेक भी जरूरी

राज्यपाल ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि आज के समय में केवल जानकारी हासिल करना पर्याप्त नहीं है। विद्यार्थी को यह समझ भी होनी चाहिए कि उस ज्ञान का सही इस्तेमाल कैसे किया जाए।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी है कि वे विद्यार्थियों को ऐसा वातावरण दें, जहां वे पढ़ाई के साथ सोचने-समझने की क्षमता भी विकसित कर सकें।

राज्यपाल ने विद्यार्थियों से अपनी शिक्षा का उपयोग समाज और देश के विकास के लिए करने की अपील की। उन्होंने कहा कि संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने में युवा पीढ़ी की बड़ी भूमिका हो सकती है।

GOLDEN HIND DESK