अरावली विवाद राजनीति में भूचाल

सोशल मीडिया से शुरू हुआ संरक्षण मुद्दा, कांग्रेस-बीजेपी आमने-सामने !

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जयपुर

राजस्थान की राजनीति में अरावली पर्वतमाला को लेकर एक बार फिर बड़ा सियासी घमासान खड़ा हो गया है। सोशल मीडिया से शुरू हुआ अरावली संरक्षण का मुद्दा अब कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच सीधे राजनीतिक टकराव में बदल गया है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के हालिया बयान के बाद भाजपा ने कड़ा पलटवार करते हुए कांग्रेस पर पर्यावरण के नाम पर “राजनीतिक भ्रम फैलाने” का आरोप लगाया है।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अरावली पर्वतमाला को “राजस्थान की जीवनरेखा” बताते हुए कहा कि पूर्व में केंद्र और भाजपा शासित सरकारों की नीतियों के कारण अरावली को गंभीर नुकसान पहुंचा है। उन्होंने कहा कि अरावली का संरक्षण केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल है।

भाजपा का तीखा जवाब

मुख्यमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा नेताओं ने कांग्रेस पर पलटवार किया है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस शासन के दौरान ही अरावली क्षेत्र में अवैध खनन को बढ़ावा मिला और अब वही पार्टी पर्यावरण संरक्षण की बात कर रही है। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सोशल मीडिया के जरिए जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रही है।

भाजपा प्रवक्ताओं ने यह भी कहा कि वर्तमान सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और पर्यावरणीय नियमों के तहत काम कर रही है और अरावली क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

सोशल मीडिया से सड़कों तक पहुंचा मुद्दा

अरावली विवाद पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ट्रेंड के रूप में सामने आया, जहां पर्यावरण कार्यकर्ताओं, छात्रों और आम लोगों ने खनन और निर्माण गतिविधियों पर सवाल उठाए। इसके बाद यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया। कई जिलों में विरोध प्रदर्शन हुए और जनप्रतिनिधियों ने भी इस पर खुलकर बयान दिए।

विशेषज्ञों की चेतावनी

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली पर्वतमाला राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अरावली के कमजोर होने से भूजल स्तर, जलवायु संतुलन और मरुस्थलीकरण पर गंभीर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों ने राजनीति से ऊपर उठकर दीर्घकालिक नीति बनाने की मांग की है।

आगे क्या?

अरावली को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच बयानबाजी लगातार तेज होती जा रही है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा विधानसभा से लेकर सड़कों और चुनावी मंचों तक और गर्माने की संभावना है। वहीं, जनता और पर्यावरण संगठनों की नजर सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई है।